
वहाँ उस बरगद के पेड़ के नीचे
एक चाय की गुमटी थी,
मैं था, मेरे यार थे ,और सपने थे,
वहीँ; उस बरगद के पेड़ के नीचे
वो चाय की गुमटी आज भी है,
यार भी हैं , सपने भी हैं,
पर वे मेरे अपने नहीं,
मुझे मेरे यारों को सपनों को
वक़्त दफ़नाकर
दौड़ता हुआ कहीं दूर निकल गया......
ha dost...clc k bargad ke neeche ki is dastaan men lekhni ek hai magar juban kayion ki shamil hai...
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