Wednesday, August 25, 2010

यूँ ही कैम्पस से गुजरते हुए


वहाँ उस बरगद के पेड़ के नीचे
एक चाय की गुमटी थी,
मैं
था, मेरे यार थे ,और सपने थे,
वहीँ; उस बरगद के पेड़ के नीचे
वो चाय की गुमटी आज भी है,
यार
भी हैं , सपने भी हैं,
पर
वे मेरे अपने नहीं,
मुझे
मेरे यारों को सपनों को
वक़्त दफ़नाकर
दौड़ता
हुआ कहीं दूर निकल गया......

1 comment:

  1. ha dost...clc k bargad ke neeche ki is dastaan men lekhni ek hai magar juban kayion ki shamil hai...

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