अब इतिहास का
अन्त हो चुका है
दक्षिण और वाम का
द्वंद्व खो चुका है
ध्रुवों के धुरी से निकलकर
अब सब कुछ तिकोना हो चुका है
हर वाद अब निर्विवाद
''पोस्ट'' हो चुका है
बहुत से विचारों के
अन्त की अब निकटता है
अब नयी आधुनिकता
उत्तर आधुनिकता है
अब उदार लोकतंत्र पर दुनिया की
मुक्ति का सपना सवार है
उत्तर , दक्षिण,मध्य और पूरब
अब इसका ही प्रचार है
सिसकियों और आंसुओं को जज्ब कर
कुछ नए हाथ अब हथियार थाम रहें हैं
अब कहीं दूर जंगलों में
गोलियों की अनुगूँज सुनायी दे रही है
कुछ लाल सायों को एक बदलती
तस्वीर दिखाई दे रही है
अब हत्याएं नहीं
आत्महत्याएँ होनी लगी हैं
अब अमीरों की अमीरी
और गरीबों की गरीबी
लगातार बढ़ने लगी है
आम आदमी की जेब
अब रोज़ घटने लगी है
तंत्र का बेतंत्र होना अब
आम बात हो चुकी है
बेज़मीरी अब जीवन की आदत
हो चुकी है
इनसे लड़ने वालों का अब
जेल हो चुकी है
बाज़ार अब जरूरतें पूरा नहीं
जरूरतें बनाने लगा है
अब जीवन का आदर्श विज्ञापनों
से निकलने लगा है
सौन्दर्य का परिमाण
अब नायिकाओं के कपडे और कमर
से नपने लगा है
अब आँख से आंसू ही नहीं
सपने भी सूखने लगे हैं
हमारी आत्मा को अब
घुन चखने लगे हैं
अब आशा से उन्मत्त गीत भी
थमनें लगे हैं
दुनिया के हर चौराहे पर
अब
नए नाटक का मंचन चल रहा है
बहुदलीय तंत्र नए नए सपनों से
अब रोज़ छल रहा है
हर कोने में अब एक नया विद्रोह
पल रहा है
अब हम चेहरे वाली किताबों पे
टिप्पणी जश्न मानते हैं
अंतरजाल की दुनिया से अपना
रोष जताते हैं
अब
कभी-कभी
मोमबत्ती हाथ में लेकर
इंडियागेट भी जातें हैं
रिश्तों के सब अर्थ अब बेमानी
हो चुके हैं
स्मृतियों के पिटारे भी अब
खाली हो चुके हैं
इंसानों पे अब सिक्के बहुत
भारी हो
चुकें हैं
अब कोई वसंत के आने का
सपना नही देखता है
अब कोई सावन के आने का
इंतजार नहीं करता है
अब कुछ भी हमें बेचैन
नहीं करता है
असमानताएं अब हमें
विचलित नहीं करती हैं
भूख से मौतें अब हमें
चिंतित नही करती हैं
संवेदनाएं अब विप्लव
में नहीं ढलतीं हैं
अब तो बहुत दिनों से ये
धरा भी खामोश है
मेघों का गर्जन भी
अब प्रशांत है
हवा भी नीरव निस्तब्ध
और शांत है
व्योम में लगातार एक
शून्य व्याप्त है
अब ना कोई साज़ है
ना कोई आवाज़ है
विस्मृतियों के खंडहर
पर ये एक
बदलती
दुनिया का
आगाज़ है...........