कल शाम खिड़की पर
उग आया था चाँद
रात को बिस्तर के
सिरहाने बैठा पाया उसे
सिरहाने बैठा पाया उसे
सारी रात एहसासों की
चांदिनी बिखरती रही,
अरमानो और ख्वाइशों
से सजती रही,
ना जाने कैसे कैसे सपने
बुनती रही
सवेरा होते ही
जालिम सूरज ने
चांदिनी को समेट लिया
सारा दिन वो मुझको
जलाता रहा,
कड़वी हकीकत का जाम
पिलाता रहा,
जीवन को तरह तरह से
बोझिल बनाता रहा
अब शाम होने को है
और मै खिड़की पर
खड़ा हूँ,
शायद मुझको
चाँद के उगने का
इंतजार है..........................
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