Friday, April 22, 2011

बदलाव

अब इतिहास का
अन्त हो चुका है
दक्षिण और वाम का
द्वंद्व खो चुका है
ध्रुवों के धुरी से निकलकर
अब सब कुछ तिकोना हो चुका है
हर वाद अब निर्विवाद
''पोस्ट'' हो चुका है

बहुत से विचारों के
अन्त की अब निकटता है
अब नयी आधुनिकता
उत्तर आधुनिकता है
अब उदार लोकतंत्र पर दुनिया की
मुक्ति का सपना सवार है
उत्तर , दक्षिण,मध्य और पूरब
अब इसका ही प्रचार है

सिसकियों और आंसुओं को जज्ब कर
कुछ नए हाथ अब हथियार थाम रहें हैं
अब कहीं दूर जंगलों में
गोलियों की अनुगूँज सुनायी दे रही है
कुछ लाल सायों को एक बदलती
तस्वीर दिखाई दे रही है

अब हत्याएं नहीं
आत्महत्याएँ होनी लगी हैं
अब अमीरों की अमीरी
और गरीबों की गरीबी
लगातार बढ़ने लगी है
आम आदमी की जेब
अब रोज़ घटने लगी है

तंत्र का बेतंत्र होना अब
आम बात हो चुकी है
बेज़मीरी अब जीवन की आदत
हो चुकी है
इनसे लड़ने वालों का अब
जेल हो चुकी है

बाज़ार अब जरूरतें पूरा नहीं
जरूरतें बनाने लगा है
अब जीवन का आदर्श विज्ञापनों
से निकलने लगा है
सौन्दर्य का परिमाण
अब नायिकाओं के कपडे और कमर
से नपने लगा है

अब आँख से आंसू ही नहीं
सपने भी सूखने लगे हैं
हमारी आत्मा को अब
घुन चखने लगे हैं
अब आशा से उन्मत्त गीत भी
थमनें लगे हैं

दुनिया के हर चौराहे पर
अब
नए नाटक का मंचन चल रहा है
बहुदलीय तंत्र नए नए सपनों से
अब रोज़ छल रहा है
हर कोने में अब एक नया विद्रोह
पल रहा है

अब हम चेहरे वाली किताबों पे
टिप्पणी जश्न मानते हैं
अंतरजाल की दुनिया से अपना
रोष जताते हैं
अब
कभी-कभी
मोमबत्ती हाथ में लेकर
इंडियागेट भी जातें हैं

रिश्तों के सब अर्थ अब बेमानी
हो चुके हैं
स्मृतियों के पिटारे भी अब
खाली हो चुके हैं
इंसानों पे अब सिक्के बहुत
भारी हो
चुकें हैं

अब कोई वसंत के आने का
सपना नही देखता है
अब कोई सावन के आने का
इंतजार नहीं करता है
अब कुछ भी हमें बेचैन
नहीं करता है

असमानताएं अब हमें
विचलित नहीं करती हैं
भूख से मौतें अब हमें
चिंतित नही करती हैं
संवेदनाएं अब विप्लव
में नहीं ढलतीं हैं

अब तो बहुत दिनों से ये
धरा भी खामोश है
मेघों का गर्जन भी
अब प्रशांत है
हवा भी नीरव निस्तब्ध
और शांत है
व्योम में लगातार एक
शून्य व्याप्त है

अब ना कोई साज़ है
ना कोई आवाज़ है
विस्मृतियों के खंडहर
पर ये एक
बदलती
दुनिया का
आगाज़ है...........

























Wednesday, April 20, 2011

एक उदास दिन

आज कुछ धुआं सा
आसमान पर छाया रहा
आज सूरज भी कुछ
मद्धिम सा जलता रहा

आज शाम भी
कुछ बेचैन ,बेआस थी
आज आँख भी कुछ नम और
बेक़रार थी

आज रात भी
कुछ
अजीब
स्याह है
आज हवा भी कुछ थमी सी है ,
और मिजाज़ भी कुछ परेशान है

आज कोई आहट नहीं
कोई सरगोशी नहीं
आज सन्नाटे के आगोश में
तमन्ना भी कुछ खामोश है

आज चाँद भी नहीं ,
तारे भी नहीं,
आज तुम भी नहीं
तेरी याद भी नहीं
आज मौसम ही कुछ
उदास है...................


Monday, April 18, 2011

इंतजार .......

कल शाम खिड़की पर
उग आया था चाँद

रात को बिस्तर के
सिरहाने बैठा पाया उसे

सारी रात एहसासों की
चांदिनी बिखरती रही,
अरमानो और ख्वाइशों
से सजती रही,
ना जाने कैसे कैसे सपने
बुनती रही

सवेरा होते ही
जालिम सूरज ने
चांदिनी को समेट लिया

सारा दिन वो मुझको
जलाता रहा,
कड़वी हकीकत का जाम
पिलाता रहा,
जीवन को तरह तरह से
बोझिल बनाता रहा

अब शाम होने को है
और मै खिड़की पर
खड़ा हूँ,
शायद मुझको
चाँद के उगने का
इंतजार है..........................

Tuesday, April 12, 2011

तुम

मेरे पास
बहुत ही पास
रहता था एक पल

और उस एक पल
में अपनी ही दुनिया का
भरम था

एक दिन तुमने
कोशिश की
और उस पल में पनाह ले ली

अब उस पल में
मेरे पास,उस पल के पास
तुम भी रहने लगे

और अब उस पल में
एक नयी ही दुनिया
का भरम था

एक दिन तुमने
पूछा की क्यूँ वो पल
तुमसे भी पास रहता है मेरे

और फिर तुम
उस पल से भी पास
मेरे पास ,रहने लगे

एक दिन तुमने
उस पल को पीछे
बहुत पीछे छोड़ दिया

और अब तुम
सिर्फ तुम रहते थे
एक नए पल में

एक दिन तुमने
उस पल की तरह
मुझे भी पीछे छोड़ दिया

अब मेरे पास
वो पल भी नहीं,
नया पल भी नहीं

अब मेरे पास
कोई पल नहीं
अब अकेला रहता हूँ मैं.............

Sunday, April 10, 2011

मेरा कमरा

चार दीवारों के बीच
मैं सिमटा सा
प्रश्नों में उलझा रहता हूँ

किसी कोने में मार्क्स की दस्तक
कहीं गाँधी का जंतर है
तो कहीं स्मिथ उदारवाद का कटोरा लिए खड़े हैं

कभी बिजली पानी का संकट लिए
बी.बी.सी. की आवाज़
कहीं वाल्ड सिटी से वर्ल्ड सिटी के सपने
से अटें पड़े अखबार
तो कहीं एफ़.एम. और विविध भारती
के विविध रंग

किसी कोने में
इतिहास, राजनीति और धर्म का द्वंद्व
कहीं दर्शन और विज्ञान का अंतर्संबंध है
तो कहीं दिल में कुछ करने का जज्बा भी है

और इन सब के बीच
तेरी याद भी तो है,
और तेरा नाम लेते ही फ्रायड
ने निकाल ली तलवार
तो कहीं हारमोंस और जेनेटिक्स
विमर्श शुरू हो गया

और मैं हूँ की
इन्ही में सिमटता और पसरता रहता हूँ
तभी एक कोने में वेदांता लिए
विवेकानंद मुस्कुराते हैं
शायद मेरी कंडीशनल आज़ादी पर

और मैं हूँ की
अपने को ढूंढता
डार्विन के सरवाईवल ऑफ़ फिटेस्ट की
चक्कियों में पिसता रहता हूँ
लड़ना है मगर किस वाद से
इस पर भी मन में विवाद
धर्म , सत्ता ,धन, शौर्य
या कुछ और,
आखिर क्या चाहिए

शायद चाहिए
दो जून की रोटी
और कुछ पल अपने,
अपनों के साथ
तेरे साथ, तेरी यादों के साथ

और कुछ पल असीम शांति के
जब मैं इन दीवारों में कैद होकर
भी आज़ाद हो जाऊँ.....

Saturday, April 9, 2011

हौसला

तमाम जंजीरों में जकड़े
कैदी हो गए हैं हम,
और बिना लड़े अब हारने लगे हैं

मानवता की गरिमा अब धूमिल पड़ने लगी है
दुर्गों पे अन्धकार का परचम लहराने लगा है
व्योम का अन्धकार बढ़ने लगा है

मगर मत भूलो
तारों की टीम-टिमाहट अभी कम नही हुई है
सूरज और चाँद की आभा अभी नम नहीं हुई है
तमस अभी साकार नहीं हुआ है
और कुछ माशलें अभी जिन्दा हैं

हाँ पायी है .
कुछ पराजय हमने,
जज्ब किये हैं कुछ आंसू हमने
खोये हैं कुछ सपने
और खोया है बहुत कुछ

मगर समर अभी बाकी है

अभी बाकी है हममें
लड़ने का जज्बा ,
सपनों को देखने की आदत
जीतने का साहस
मानवता को जिन्दा रखने का संकल्प
और
अभी बाकी है बहुत कुछ हममें




Friday, April 8, 2011

नया रास्ता

जीवन के इतने बसंत,
और पतझड़
देखने के बाद

निराशा ,हताशा, अवसाद
और संत्राष से
गुजरने के बाद

आशा,उन्माद , उल्लास
और आनंद से
भरा होने के बाद

पता नहीं क्यूँ
आज एक खोखलेपन
का एहसास मेरे भीतर उतर गया

अब मैं
अकेला , तनहा , उदास
और शायद कुछ
सनकी भी हूँ

अब मैं
धुंधली उमीदों से चिपका
मुक्त जीवन का सपना
देखता हूँ

हाँ मुझमें
यथार्थवाद कि बेहद कमी है'
और भावना बेहद घनी है

मगर मैं अब
वो सपना देखता हूँ
जहाँ भावनाओं का यथार्थ
यंत्रणा से भरा ना हो
जहाँ कोई शुष्क
मानसिक पीड़ा ना हो
जहाँ आनंद और अवसाद
में द्वंद्व ना हो
जहाँ कोई
क्षितिज ना हो................

Tuesday, April 5, 2011

एक हादसा .....

कुछ बात तो जरुर है
आया है जो उनकी जुबाँ पे मेरा नाम
कुछ तो घटा है तेजरफ्तार ज़िंदगी में
आया है जो उनकी जुबाँ पे मेरा नाम
लुट गए , बर्बाद हुए तो क्या देर सवेर आखिर
आया है उनकी जुबाँ पे मेरा नाम
रिश्तों के हादसों में सम्हलते सम्हलते
आया है उनकी जुबाँ पे मेरा नाम
अब रात दिन कुछ आये न आये
आया है जो उनकी जुबाँ पे मेरा नाम

Thursday, March 31, 2011

I Live You

I Live You
I behold fragrance of your soul
still it disperses in mine,
I behold depth and passion of your eyes
still it reflects in mine,
I behold your touch some style
still it tickles me,
I behold your mischievous eyelids
still it have some untold stories,
I behold your pearl like tears
still find in my eyes,
I behold all your memories in my soul
still it nurtures me,
I behold everything except you
still I feel your existence
Because
I Live You............



एक ख्वाब ........

कैसे कहूँ मुझे तुमसे मोहब्बत है
कभी देखना
मेरी आँखों के सैलाब को
मोहब्बत ही मोहब्बत है

तुम्हारी तो अपनी ही दुनिया है
चाँद तारे हैं
सिंड्रेला सा स्वप्न है
आकांक्षाएं , अभिलाषाएं और कुछ अज़ीज़ हैं

और मैं यायावर
यहाँ चंद कविताएँ , कुछ अधूरे दर्शन
कुछ बिखरे ख्वाब
और जीवन की तमाम समस्याएँ

यहाँ तुम्हारा स्वप्न पूरा नहीं हो सकता
फिर भी कभी देखना
मेरी आँखों के सैलाब को

शायद कुछ ऐसा हो
जो तुम्हारी उन्मुक्तता को नया आयाम दे सके
तुम्हारे सपनो को नया संसार दे सके
तुम्हारे जीवन को नया संगीत दे सके

कभी देखना
मेरी आँखों के सैलाब को
मोहब्बत ही मोहब्बत है