Sunday, April 10, 2011

मेरा कमरा

चार दीवारों के बीच
मैं सिमटा सा
प्रश्नों में उलझा रहता हूँ

किसी कोने में मार्क्स की दस्तक
कहीं गाँधी का जंतर है
तो कहीं स्मिथ उदारवाद का कटोरा लिए खड़े हैं

कभी बिजली पानी का संकट लिए
बी.बी.सी. की आवाज़
कहीं वाल्ड सिटी से वर्ल्ड सिटी के सपने
से अटें पड़े अखबार
तो कहीं एफ़.एम. और विविध भारती
के विविध रंग

किसी कोने में
इतिहास, राजनीति और धर्म का द्वंद्व
कहीं दर्शन और विज्ञान का अंतर्संबंध है
तो कहीं दिल में कुछ करने का जज्बा भी है

और इन सब के बीच
तेरी याद भी तो है,
और तेरा नाम लेते ही फ्रायड
ने निकाल ली तलवार
तो कहीं हारमोंस और जेनेटिक्स
विमर्श शुरू हो गया

और मैं हूँ की
इन्ही में सिमटता और पसरता रहता हूँ
तभी एक कोने में वेदांता लिए
विवेकानंद मुस्कुराते हैं
शायद मेरी कंडीशनल आज़ादी पर

और मैं हूँ की
अपने को ढूंढता
डार्विन के सरवाईवल ऑफ़ फिटेस्ट की
चक्कियों में पिसता रहता हूँ
लड़ना है मगर किस वाद से
इस पर भी मन में विवाद
धर्म , सत्ता ,धन, शौर्य
या कुछ और,
आखिर क्या चाहिए

शायद चाहिए
दो जून की रोटी
और कुछ पल अपने,
अपनों के साथ
तेरे साथ, तेरी यादों के साथ

और कुछ पल असीम शांति के
जब मैं इन दीवारों में कैद होकर
भी आज़ाद हो जाऊँ.....

3 comments:

  1. डायरी से निकली एक पुरानी कविता

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  2. very nice.... i love u for this..... and many more is awaited....

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